अदालत ने ये निर्देश अशुतोष कुमार सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए। याचिका नवजात की मौत से जुड़ी है, जिसे सुलतानपुर से लखनऊ लाकर केजीएमयू, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआईएमएस) और एसजीपीजीआई में इलाज के लिए ले जाया गया था। पीठ ने कहा कि मामला केवल नवजात को पर्याप्त इलाज नहीं मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े व्यापक सवाल भी उठते हैं।
अदालत ने नए मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त ढांचागत सुविधाएं, विशेषज्ञ सेवाएं और वेंटिलेटर जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया, ताकि गंभीर मरीजों को लखनऊ न भेजना पड़े। पीठ ने कहा कि यदि नवजात को उच्च चिकित्सा केंद्र भेजना जरूरी था तो एंबुलेंस में भी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए थीं, जबकि उसे सामान्य एंबुलेंस से लाया गया। वहीं, केजीएमयू के चिकित्सकों और परिजनों ने बच्चे को अस्पताल में दिखाए जाने तथा बिस्तर उपलब्ध होने या नहीं होने को लेकर अलग-अलग दावे किए।
अदालत ने कहा कि इन विरोधाभासी दावों से सरकारी अस्पतालों में मरीजों और तीमारदारों के लिए प्रभावी मार्गदर्शन एवं परामर्श व्यवस्था की जरूरत स्पष्ट होती है। पीठ ने राज्य सरकार को पूरे घटनाक्रम की जांच कराकर 15 दिन में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने अभी किसी चिकित्सक या अस्पताल की लापरवाही पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है।
जांच में कमी या लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारी तय करने और परिवार को मुआवजा देने पर विचार किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई एक अक्टूबर को होगी। पीठ ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव तथा केजीएमयू, एसजीपीजीआई और आरएमएलआईएमएस से संबंधित चिकित्सकों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने का निर्देश दिया है।
