Flickr Images

सिरप का ज़हरीला जाल: वाराणसी में 100 करोड़ का कोडीन रैकेट और सिस्टम की चूकों की कहानी

शावेज बन्टी 
की विशेष रिर्पोट 

वाराणसी@उड़ान इंडिया: उत्तर प्रदेश की गलियों में छुपा एक ऐसा नेटवर्क उजागर हुआ है, जिसने चिकित्सा दवाई — जिसे “उपचार” कहा जाना चाहिए — को नशे की चपेट में बदल दिया। यह कहानी है वाराणसी-केंद्रित कोडीन-युक्त कफ सिरप रैकेट की, जिसकी कुल अनुमानित वैल्यू लगभग ₹100 करोड़ है और जिसे कथित तौर पर शुभम जायसवाल और उनके पिता ने संचालित किया।

रैकेट का फसल: कैसे शुरू हुआ खेल

UP FSDA (Food Safety & Drug Administration) और पुलिस की एक संयुक्त विशेष कार्रवाई ने हाल ही में इस रैकेट को तोड़ दिया है। जांच में पाया गया कि 2023 से 2025 के बीच लगभग 89 लाख बोतलें कोडीन सिरप सप्लाई की गई थीं, जो नशे के इरादे से इस्तेमाल की जा रही थीं।  समस्या सिर्फ खनिज दवा की “मांग” या “गलत उपयोग” की नहीं थी — यह एक संगठित, व्यावसायिक नेटवर्क था, जिसमें फर्जी कंपनियां, बंद हो चुकी दवाइयों की फर्में, नकली बिल और लाइसेंस का इस्तेमाल हो रहा था। 

कनेक्शन वाराणसी: जाल का हब

यह रैकेट वाराणसी को अपने केंद्र के रूप में इस्तेमाल करता रहा। FSDA और पुलिस की जाँच में 93 फर्मों की पहचान हुई है, जिनमें से कई “कागज़ों की कंपनी” थीं — या बंद थीं, या उनका कोई वास्तविक कारोबार नहीं था। 
विशेष जांच के बाद FIR में 28 फर्मों और व्यापारियों को आरोपी बनाया गया है। 

शुभम जायसवाल और उसकी भूमिका

मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने आया है शुभम जायसवाल, जो वाराणसी के प्रह्लाद घाट का निवासी है, साथ ही उसके पिता भोला नाथ प्रसाद का भी नाम जांच में जुड़ा हुआ है। उसके कंपनी Shaily Traders (रांची) और New Vriddhi Pharma (वाराणसी) के माध्यम से यह रैकेट संचालित किया गया, जो ड्रग लाइसेंस कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन है। जांच में यह भी सामने आया कि कई फर्में सिर्फ कागज़ों पर थीं , खरीद-बिक्री बिल नकली, स्टोर्स बंद, नाम मात्र के थे। शुभम की संपत्ति में तेज़ी से वृद्धि और कथित राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने भी अधिकारियों को सतर्क किया। वर्तमान में शुभम जायसवाल फरार है, और उसे पकड़ने के लिए लुकआउट नोटिस जारी है। 

बड़ी छापेमारी: जब जाल खुला

  • तीन-दिन की विशेष FSDA-पुलिस कार्रवाई: यह ऑपरेशन FSDA कमिश्नर रोशन जैकब के नेतृत्व में चला, जो पूरे मामले की गहराई तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। 

  • एक गोदाम से जब्तियाँ: वाराणसी के भदवार क्षेत्र में छापेमारी में 93,750 बोतलें कोडीन सिरप की बरामद की गईं, जिनकी कीमत करीब ₹1.96 करोड़ बताई गई है। 

  • बरामद सिरप में 75,150 बोतलें EsKuf और 18,600 बोतलें एक्सपायर्ड Phensedyl थीं। 

  • गोदाम के पते से जुड़े बिल और दस्तावेजों ने और संदेहों को जन्म दिया — जैसे RS Pharma, गाज़ीपुर के बिल, और Singh Medico, Chandauli को डिलीवरी का रिकॉर्ड। 

राज्यव्यापी एवं अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन

इस रैकेट का विस्तार सिर्फ वाराणसी या यूपी तक सीमित नहीं रहा। जांच में सामने आया है कि सिरप बांग्लादेश और खाड़ी (Gulf) देशों तक भेजा गया था। इसके अलावा, यूपी FSDA ने प्रदेश में 30 से अधिक जगहों पर छापे मारे और कई अन्य लिंक खोजे गए, जिससे यह साफ हुआ कि यह नेटवर्क अकेला नहीं बल्कि बड़ा और विस्तृत है। 

अन्य गिरोहों का खुलासा

वाराणसी-केंद्रित रैकेट के अलावा, FSDA ने लखनऊ में भी दो अन्य कंपनियों पर कार्रवाई की है — Arpic Pharmaceuticals Pvt Ltd और Idhika Lifesciences Pvt Ltd। इन कंपनियों के खिलाफ आरोप है कि उन्होंने नशे के रूप में उपयोग होने वाली कोडीन सिरप की खेप को बंद या निष्क्रिय मेडिकल स्टोर्स के नाम पर भेजा, और फर्जी बिलिंग की व्यवस्था की। FSDA ने इन दोनों कंपनियों के लाइसेंस निलंबित कर दिए हैं और उनकी इन्वेंटरी जब्त की है। 

कानूनी लड़ाई और आगे की दिशा

  • FIR दर्ज: वाराणसी में 28 व्यक्तियों/फर्मों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया, जिसमें शुभम जायसवाल और उनके पिता भी शामिल हैं। 

  • विशेष जांच टीम (SIT): ADCP T. Sarvanan की अगुवाई में SIT बनाई गई है, और अब यह टीम जाँच में तेजी ला रही है। 

  • नियामक दबाव: FSDA ने न सिर्फ लाइसेंस निलंबित किये हैं, बल्कि दवा वितरण चैनलों की मॉनिटरिंग को भी और सख़्त बनाने का संकेत दिया है।

  • भविष्य की चुनौतियाँ: यह मामला दिखाता है कि दवा लाइसेंसिंग, औषधि वितरण और नियमन व्यवस्था में बड़े पैमाने पर लोच (loopholes) हैं — जो नशे की दवाओं के आदान-प्रदान और गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं।

नतीजा और संदेश

यह रैकेट सिर्फ एक “दवाई स्कैम” नहीं है — यह सामाजिक चेतना, नियामक जवाबदेही और अपराध की वित्तीय संरचना का सबूत है। कोडीन सिरप, जिसे चिकित्सा जरूरतों के लिए सीमित रूप से उपयोग किया जाना चाहिए, बड़े पैमाने पर नशे के एक साधन में बदल गया। शुभम जायसवाल और गिरोह ने नामी-नोनाम कंपनियों, फर्जी दस्तावेजों और बंद स्टोर्स के जाल का उपयोग किया और लगभग ₹100 करोड़ की दवाई को गैरकानूनी बाज़ार में पहुंचाया। यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है:

  • किस हद तक दवा व्यवसाय वैधानिकता और नशा कारोबार के बीच धुंधली सीमा बन गया है?

  • क्या हमारी निगरानी तंत्र (जैसे FSDA, पुलिस) काफी मजबूत और जागरूक हैं?

  • भविष्य में दवाओं की बिक्री, लाइसेंसिंग और वितरण को कैसे जवाबदेह और पारदर्शी बनाया जाए?