रैकेट का फसल: कैसे शुरू हुआ खेल
UP FSDA (Food Safety & Drug Administration) और पुलिस की एक संयुक्त विशेष कार्रवाई ने हाल ही में इस रैकेट को तोड़ दिया है। जांच में पाया गया कि 2023 से 2025 के बीच लगभग 89 लाख बोतलें कोडीन सिरप सप्लाई की गई थीं, जो नशे के इरादे से इस्तेमाल की जा रही थीं। समस्या सिर्फ खनिज दवा की “मांग” या “गलत उपयोग” की नहीं थी — यह एक संगठित, व्यावसायिक नेटवर्क था, जिसमें फर्जी कंपनियां, बंद हो चुकी दवाइयों की फर्में, नकली बिल और लाइसेंस का इस्तेमाल हो रहा था।
कनेक्शन वाराणसी: जाल का हब
शुभम जायसवाल और उसकी भूमिका
बड़ी छापेमारी: जब जाल खुला
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तीन-दिन की विशेष FSDA-पुलिस कार्रवाई: यह ऑपरेशन FSDA कमिश्नर रोशन जैकब के नेतृत्व में चला, जो पूरे मामले की गहराई तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे।
एक गोदाम से जब्तियाँ: वाराणसी के भदवार क्षेत्र में छापेमारी में 93,750 बोतलें कोडीन सिरप की बरामद की गईं, जिनकी कीमत करीब ₹1.96 करोड़ बताई गई है।
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बरामद सिरप में 75,150 बोतलें EsKuf और 18,600 बोतलें एक्सपायर्ड Phensedyl थीं।
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गोदाम के पते से जुड़े बिल और दस्तावेजों ने और संदेहों को जन्म दिया — जैसे RS Pharma, गाज़ीपुर के बिल, और Singh Medico, Chandauli को डिलीवरी का रिकॉर्ड।
राज्यव्यापी एवं अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन
अन्य गिरोहों का खुलासा
कानूनी लड़ाई और आगे की दिशा
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FIR दर्ज: वाराणसी में 28 व्यक्तियों/फर्मों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया, जिसमें शुभम जायसवाल और उनके पिता भी शामिल हैं।
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विशेष जांच टीम (SIT): ADCP T. Sarvanan की अगुवाई में SIT बनाई गई है, और अब यह टीम जाँच में तेजी ला रही है।
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नियामक दबाव: FSDA ने न सिर्फ लाइसेंस निलंबित किये हैं, बल्कि दवा वितरण चैनलों की मॉनिटरिंग को भी और सख़्त बनाने का संकेत दिया है।
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भविष्य की चुनौतियाँ: यह मामला दिखाता है कि दवा लाइसेंसिंग, औषधि वितरण और नियमन व्यवस्था में बड़े पैमाने पर लोच (loopholes) हैं — जो नशे की दवाओं के आदान-प्रदान और गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं।
नतीजा और संदेश
यह रैकेट सिर्फ एक “दवाई स्कैम” नहीं है — यह सामाजिक चेतना, नियामक जवाबदेही और अपराध की वित्तीय संरचना का सबूत है। कोडीन सिरप, जिसे चिकित्सा जरूरतों के लिए सीमित रूप से उपयोग किया जाना चाहिए, बड़े पैमाने पर नशे के एक साधन में बदल गया। शुभम जायसवाल और गिरोह ने नामी-नोनाम कंपनियों, फर्जी दस्तावेजों और बंद स्टोर्स के जाल का उपयोग किया और लगभग ₹100 करोड़ की दवाई को गैरकानूनी बाज़ार में पहुंचाया। यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है:
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किस हद तक दवा व्यवसाय वैधानिकता और नशा कारोबार के बीच धुंधली सीमा बन गया है?
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क्या हमारी निगरानी तंत्र (जैसे FSDA, पुलिस) काफी मजबूत और जागरूक हैं?
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भविष्य में दवाओं की बिक्री, लाइसेंसिंग और वितरण को कैसे जवाबदेह और पारदर्शी बनाया जाए?

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