आइए समझते हैं कि भारत के चुनाव आयोग (ECI) के नियम इस पार्टी की राह में कैसे रोड़ा बन सकते हैं।
दो श्रेणियों में बँटे होते हैं चुनाव चिह्न
भारत में चुनाव चिह्न का आवंटन भारतीय चुनाव आयोग द्वारा 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के तहत किया जाता है। ये दो श्रेणियों में होते हैं:
आरक्षित प्रतीक: ये उन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के लिए होते हैं जिन्होंने पिछले चुनावों में एक निश्चित वोट प्रतिशत हासिल किया हो (जैसे कमल, हाथ, झाड़ू)।
मुफ्त प्रतीक (Free Symbols): ये नए पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए होते हैं। चुनाव आयोग के पास 100 से अधिक ऐसे प्रतीकों की एक सूची है।
क्या 'कॉकरोच' मिल सकता है चुनाव चिह्न?
CJP के नाम में ही कॉकरोच है, लेकिन आयोग के नियम यहां सख्त हैं। एक नई पार्टी आयोग के सामने अपनी पसंद के 3 चिन्हों का प्रस्ताव रख सकती है। हालांकि, 1968 के आदेश के अनुसार, कोई भी ऐसा चिह्न नहीं दिया जा सकता जो:
किसी जानवर या पक्षी का हो (पर्यावरण और जीव अधिकार चिंताओं के कारण ECI ने जानवरों के प्रतीकों पर रोक लगा दी है)।
धार्मिक या सांप्रदायिक भावनाएं भड़काता हो।
भद्दा या अपमानजनक प्रतीत होता हो।
ऐसे में 'कॉकरोच' जैसे जीव का चित्र चुनाव चिह्न के रूप में मिलना लगभग नामुमकिन है।
मोबाइल फोन पर भी फंस सकता है पेंच
CJP ने अपनी ब्रांडिंग में 'मोबाइल फोन' को विकल्प के तौर पर रखा है। लेकिन यहां भी पेंच है। चुनाव आयोग की मुफ्त प्रतीकों की सूची में मोबाइल फोन पहले से शामिल हो सकता है, लेकिन यह 'पहले आओ-पहले पाओ' के आधार पर मिलता है। यदि किसी अन्य पार्टी ने इसे पहले ही चुन लिया है या यह किसी विशेष क्षेत्र में आरक्षित है, तो CJP को यहां भी निराशा हाथ लग सकती है।
क्या है आगे की राह?
किसी भी नई पार्टी के लिए रजिस्ट्रेशन पहला कदम है, लेकिन जनता के बीच पहचान बनाने के लिए एक स्थायी चुनाव चिह्न का होना जरूरी है। CJP को आयोग की दी गई सूची में से ही किसी एक निर्जीव वस्तु का चुनाव करना होगा। सोशल मीडिया पर वायरल होना एक बात है, लेकिन भारतीय चुनावी नियमों की जटिलताओं को पार करना किसी भी नई पार्टी के लिए एक अग्निपरीक्षा जैसा है।
